चाँद के बारे में बहुत-सी कल्पनाएँ की जाती रही हैं- पहली तो यही कि वह दुनिया भर के बच्चों का मामा है। बच्चे अक्सर रार मचाकर माताओं से चन्द्रखिलौना माँगा करते हैं। माताएँ थाली में पानी भरकर उन्हें चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब दिखाया करती हैं और जब वह उनकी पकड़ में नहीं आता तो वे रोने लगते हैं।
दार्शनिक कहते हैं कि चाँद तो धरती माता के मन की तरह है। वह ठीक हमारे मन की तरह पकड़ में नहीं आता। उसकी रोशनी चुपके-से धरती पर उगने वाली वनस्पतियों में रस का संचार किया करती हैं। हम अपने घरों की छतों पर शरदपूर्णिमा की रात में खीर, दूध और गन्ने रख दिया करते हैं और यह आशा करते हैं कि चाँद इन वस्तुओं में भी अपना अमृत उँडेल देगा।
जिसकी जैसी भावना होती है चाँद उसे वैसा ही दिखायी देता है- चन्द्रमा के चेहरे पर दीखती श्याम आकृति के बारे में खगोलशास्त्री कहते हैं कि उस पर काले पहाड़ हैं जो हमें इतनी दूर धरती पर खड़े होकर भी दिखायी देते रहते हैं। सौंदर्य प्रेमी कहते हैं कि जब कामदेव की पत्नी रति का मुख बनाने के लिए सौंदर्य सामग्री जरूरत पड़ी तो चन्द्रमा से कुछ भाग निकाल लिया गया। इसी कारण उसमें गङ्ढा हो गया जो धरती से एक ऍंधेरे छेद की तरह दिखायी देता है। भक्तजन मानते हैं कि भगवान का रंग ही साँवला है और कल्पना करते हैं कि भक्तों की तरह चाँद भी भगवान को अपने हृदय में बसाये हुए हैं। इस कारण उस पर भगवान के साँवलेपन की छाया है।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में जब महात्मा गाँधी ने चरखे को आन्दोलन का रूप दिया तब भारत के लोग कल्पना करने लगे कि चाँद पर बैठकर कोई बुढ़िया चरखे पर सूत कात रही है। गांधी जी स्वयं कहते थे कि गरीब आदमी के लिए जो आर्थिक परिस्थिति है उसी से उसका आध्यात्मिक मन बनता है। अभावग्रस्त आगमी भौतिक अभावों की बोली ही बोलता है और उसे अपनी इसी भावना के अनुरूप जीवन सत्य के दर्शन होते हैं। गरीब आदमी के जीवन को समृध्द समाज द्वारा अपने लिए परिकल्पित किसी सुखद अहसास में नहीं धकेला जा सकता।
चन्द्रयात्रियों ने जब अन्तरिक्ष से धरती को देखा तो उन्हें वह थाली की तरह गोल दिखी। धरती हम सबकी कल्पना में थाली की तरह ही आती है क्योंकि वह हमें प्रतिदिन परोसती है। सबकी माता होने के कारण पालती-पोसती है। तरक्की पसन्द कवि-शाइर तो अपनी कविताओं और शाइरी में कहा ही करते हैं कि गरीब आदमी को पूरा चाँद रोटी की तरह दिखायी देता है।
यदि समाज हम कल्पना करें कि धरती पर पाँव फैलाते लकदक बहुराष्ट्रीय बाजारों के प्रांगण में चमकते पूरे चाँद पर जो छाया दिखायी देती है वह उन गरीब लोगों की परछाईयों की तरह है जो बाजारों और सिमटी हुई गलियों के दबे-छिपे कोनों में अपनी छोटी-सी ढिबरी जलाए आज भी कुछ केना-कबार बेचकर अपने परिवार का गुजारा चलाया करते हैं।
हम कल्पना करें कि चाँद के चेहरे पर पड़ी यह छाया उन गरीब औरतों की भी है जो दिन-रात अगरबत्ती भाँजकर हमारे घरों को खुशबुओं से भरती हैं । वे रोज हमारे लिए अरबों पापड़ बेल रही हैं। चाँद पर पड़ी हुई यह छाया उन लाखों हथकरघा बुनकरों की परछाईयों की भी है जो दिन-रात हमारे लिए कपड़ा बुनते रहते हैं। चाँद पर पड़ी यह छाया उन ताँबई देहवाली वनवासी स्त्रियों की भी है जिनका पूरा जीवन जंगलों में लकड़ियों बटोरते और महुआ बीनते बीतता है। यह छाया बड़े सबेरे घर से निकल पड़े और देर रात काम से लौट रहे उन मजदूरों की थकान की है जो जीवन भर नहीं मिटती। यह छाया धरती के उस छोटे-से टुकड़े की भी है जिसे उपजाऊ बनाए रखने के लिए एक किसान पूरा जीवन लगा देता है। भारत के आकाश में उगे चाँद पर सदियों से अभावग्रस्त जीवन की छाया पड़ रही है।
Friday, May 22, 2009
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